Home पॉलिटिक्स BJP Political Crisis : उत्तराखंड में सबसे बडा सवाल, अगला कौन ?

BJP Political Crisis : उत्तराखंड में सबसे बडा सवाल, अगला कौन ?

डॉ. धन सिंह रावत की खासियत है कि वह किसी भी ग्रुप में आसानी से मिल जाते हैं। वहीं, डॉ. रावत सीएम त्रिवेंद्र की भी पहली पसंद हैं। प्रदेश में अपने चार साल के कार्यकाल में उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में कई अहम उठाए हैं।

नई दिल्ली। देहरादून से लेकर दिल्ली तक बीते एक सप्ताह से जो सियासी खींचतान चली, उसका पटाक्षेप मंगलवार दोपहर बाद हो गया। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने प्रदेश के राज्यपाल बेबी रानी मौर्य को अपना इस्तीफा सौंपा। उसके बाद उन्होंने मीडिया से बात की और राज्य की जनता को धन्यवाद दिया। अब उत्तराखंड के लिए सबसे बडा सवाल है कि अगला मुख्यमंत्री कौन बनेगा ? त्रिवेंद्र सिंह रावत के साथ ऐसा क्यों हुआ ? वाकई रमन सिंह और दुष्यंत सिंह गौतम की रिपोर्ट पर भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व ने कार्रवाई की ?

जिस प्रकार से हालात बन रहे हैं उसमें राज्य के शिक्षा मंत्री धनसिंह रावत का नाम सबसे उपर चल रहा है। हालांकि, सांसद अनिल बलूनी, अजय भट्ट और सतपाल महाराज के नामों की चर्चा अलग-अलग माध्यमों से हो रही है। भाजपा की राजानीति को देखा जाए तो वह किसी सांसद को राज्य का मुख्यमंत्री नहीं बनाती। उत्तराखंड में तो और नहीं बनाएगी। महज साल भर के लिए एक विधानसभा चुनाव और सांसद चुनाव कराना कोई तर्कसंगत नहीं माना जाता है।

जिस प्रकार से श्रीनगर से डॉ. धन सिंह रावत को लाने के लिए उत्तराखंड सरकार के मुख्यमंत्री का हेलिकाॅप्टर गया और वो उससे आए। उसके बाद ही मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने अपना इस्तीफा राज्यपाल को सौंपा, इससे तो संकेत यही मिल रही है कि भाजपा के लिए वर्तमान राजनीतिक घटनाक्रम में धन सिंह रावत का महत्व सबसे अधिक है। जिस हिसाब से राज्य का जातिगत समीकरण है, उसमें रावत के बदले रावत आने से समाज का गुस्सा भी भाजपा को नहीं झेलना होगा। कांग्रेस भी हरीश रावत की अगुवाई में अगले साल विधानसभा चुनाव में आएगी, इसकी पूरी संभावना है।

पिछले कई सालों से आरएसएस में पकड़ बनाए हुए डॉ. रावत की राजनीति में बहूत ही सरल पहचान है। वह किसी भी विशेष ग्रुप में शामिल नहीं है। डॉ. धन सिंह रावत की खासियत है कि वह किसी भी ग्रुप में आसानी से मिल जाते हैं। वहीं, डॉ. रावत सीएम त्रिवेंद्र की भी पहली पसंद हैं। प्रदेश में अपने चार साल के कार्यकाल में उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में कई अहम उठाए हैं। सरकारी कॉलेजों में इंटरनेट की सुविधा से लेकर साइंस स्टूडेंट्स के लिए हाईटैक लैब बनाने की अहम पहल भी की है।

वहीं, राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी का नाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के भरोसेमंद में शुमार है, लेकिन उनका स्वास्थ्य हाल के दिनों में बेहतर नहीं बताया जाता है। हरिद्वार से सांसद व केंद्रीय शिक्षा मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक सहित नैनीताल सांसद अजय भट्ट के नाम की भी चर्चा है। निशंक उत्तराखंड के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं जबकि भट्ट ने भाजपा प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी भी संभाली है और वह पहली बार संसद तक पहुंचे हैं।

पार्टी के रणनीतिकार राज्यसभा सांसद को मुख्यमंत्री बनाने की सलाह नहीं देंगे। अगर किसी सांसद को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी जाती है तो सरकार को छह महीने के अंदर उपचुनाव कराना होगा जबकि अगले साल 2022 में उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव भी हैं।

पार्टी सूत्रों ने बताया है कि भाजपा आलाकमान सबकुछ तय कर चुकी है। तभी तो स्वयं निवर्तमान मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने अपने संबोधन में कहा कि मैंने अभी अपना त्याग पत्र राज्यपाल को सौंप कर आया हूं। कल मुख्यालय पर 10 बजे पार्टी विधानमंडल दल की बैठक है। सभी विधायक वहां मौजूद रहेंगे।

अपने संबोधन में निर्वतान मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने कहा कि विगत 4 वर्षों से भाजपा ने मुझे सीएम के रूप में उत्तराखंड में सेवा करने का मौका दिया। ये मेरा सौभाग्य रहा है। मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि पार्टी मुझे इतना बड़ा सम्मान देगी। पार्टी ने संयुक्त रूप से ये निर्णय लिया कि मुझे अब किसी और को ये मौका देना चाहिए।

असल में, जितनी सहजता से यह कहा गया, कहानी उतनी भर नहीं है। राज्य के कई विधायक लगातार मुख्यमंत्री के खिलाफ पार्टी को सूचित कर रहे थे। जब अधिक शिकायतें आईं तो पार्टी नेतृत्व ने पर्यवेक्षक के रूप में छत्तीसगढ के पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह और पार्टी महासचिव दुष्यंत सिंह गौतम को भेजा। इन दोनों नेताओं ने तमाम विधायकों से बात की। उसके बाद अपनी रिपोर्ट दिल्ली भेज दी। उसके बाद केंद्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने बुलाया और कहा जा रहा है कि उनके साथ ही बैठक में ही इस्तीफा का मजमून तक तैयार कर दिया गया। हालांकि, कहा जा रहा है कि त्रिवेंद्र सिंह रावत ने समस्याओं के निपटारा के लिए दो माह का समय मांगा था। लेकिन, पार्टी उन्हें अब समय देने को तैयार नहीं थी।

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