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प्रकृति से है दोनों का गहरा रिश्ता, सर्दी में उल्लास का पर्व है पोंगल और लोहड़ी

नई दिल्ली। भारत उत्सव प्रधान देश है। सर्दी के मौसम में नई उर्जा के साथ 13 जनवरी को लोहड़ी और पोंगल मनाया जाता है। उसके अगले दिन मकर संक्रांति का त्योहार आता है। इन तीनों त्योहार में एक समानता है कि ये तीनों प्रकृति पर्व है। इस समय अलग अलग राज्यों में प्रकृति से जुडे कई अन्य पर्व भी मनाएं जाते हैं। लोग एक दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं। आज देश के राष्ट्पति रामनाथ कोविंद और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित कई गणमान्य लोगों ने पूरे देश को पोंगल और लोहड़ी की शुभकामनाएं दी हैं।

दक्षिण के राज्य तमिलनाडु में आज फसलों के त्योहार पोंगल की धूम रही। पोंगल का तमिल भाषा में अर्थ होता है उफान या विप्लव। पारम्परिक रूप से ये त्योहार सम्पन्नता को समर्पित है, जिसमें समृद्धि लाने के लिए वर्षा, धूप तथा खेतिहर मवेशियों की आराधना की जाती है। आज लोगों ने पारंपरिक रीति-रिवाजों से पोंगल मनाया और अच्छे समय के प्रतीक तमिल महीने “थाई” की शुरूआत की। लोगों ने नए कपड़े पहने, पोंगल पनई (पोंगल का बर्तन) में पोंगल के मीठे चावल बनाए, गन्ना खरीदा और पारंपरिक मंत्र ‘पोंगल-ओ-पोंगल’ के साथ पूजा करते हुए सुख-समृद्धि की कामना की।

बता दें कि पोंगल तमिल हिंदुओं का एक प्रमुख त्योहार है। इस पर्व की तुलना नवरात्र से की जाती है, जो फसल की कटाई का उत्सव होता है। इसे शस्योत्सव भी कहा जाता है। यह पर्व चार दिनों तक चलता है। हर दिन पोंगल को अलग-अलग नाम से मनाया जाता है। पोंगल के पहले दिन को भोगी पोंगल कहा जाता है, जो देवराज इंद्र को समर्पित है। पोंगल का दूसरा दिन सूर्य पोंगल कहलाता है। यह भगवान सूर्य को निवेदित होता है। तीसरे दिन के पोंगल को मट्टू पोगल कहा जाता है। तमिल मान्यताओं के अनुसार, मट्टू भगवान शंकर का बैल है, अंतिम दिन कन्या पोंगल मनाया जाता है, जिसे तिरूवल्लूर के नाम से भी लोग पुकारते हैं। इस दिन घर को सजाया जाता है।

वहीं, मकर संक्रांति के एक दिन पहले मनाया जाने वाला लोहड़ी का त्योहार देशभर में आज पूरे उत्साह के साथ मनाया  जा रहा है। यूं तो लोहड़ी पर्व प्रमुख रूप से पंजाब और हरियाणा में मनाया जाने वाला सांस्कृतिक पर्व है, लेकिन अपनी लोक प्रियता के कारण यह देश के कई हिस्सों में बड़े धूमधाम के साथ मनाया जाता है।  लोहड़ी को सर्दियों के जाने और बसंत के आने का संकेत भी माना जाता है। कई जगहों पर लोहड़ी को तिलोड़ी भी कहा जाता है।

इस दिन लोग आग जलाकर इसके इर्द-गिर्द नाचते-गाते और खुशियां मनाते हैं। आग में गुड़, तिल, रेवड़ी, गजक डालने और इसके बाद इसे एक-दूसरे में बांटने की रिवाज होता है। इस दिन रबी की फसल को आग में समर्पित कर सूर्य देव और अग्नि का आभार प्रकट किया जाता है। आज के दिन किसान फसल की उन्नति की कामना करते हैं। इस दिन जलाई गई आग के पास घेरा बनाकर दुल्ला भट्टी की कहानी सुनी जाती है।

बता दें कि लोहड़ी पर दुल्ला भट्टी की कहानी सुनने का खास महत्व होता है। मान्यता है कि मुगल काल में अकबर के समय में दुल्ला भट्टी नाम का एक शख्स पंजाब में रहता था। उस समय कुछ अमीर व्यापारी सामान की जगह शहर की लड़कियों को बेचा करते थे, तब दुल्ला भट्टी ने उन लड़कियों को बचाकर उनकी शादी करवाई थी। कहते हैं तभी से हर साल लोहड़ी के पर्व पर दुल्ला भट्टी की याद में उनकी कहानी सुनाने की पंरापरा चली आ रही है। इससे घर-परिवार में सुख-समृद्धि आती है।

 

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