Guest Column : जातीय हिंसा की आग में भी अवसर तलाशती राजनीति

तृणमूल कांग्रेस के महासचिव कुणाल घोष ने कहा है कि राज्य सरकार सीबीआइ को जांच में पूरा सहयोग करेगी। बता दें कि पीठ ने इस मामले में बुधवार को स्वत: संज्ञान लिया था और राज्य सरकार से केस डायरी और स्टेटस रिपोर्ट तलब किया था। इस घटना की सीबीआइ या राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआइए) द्वारा जांच कराने की मांग वाली जनहित याचिकाओं पर भी अदालत ने स्वत: संज्ञान याचिका के साथ सुनवाई की।

निशिकांत ठाकुर

अंतरात्मा को झकझोरने वाली एक दुर्भाग्यपूर्ण ऐतिहासिक कांड बिहार की राजधानी पटना से सड़क मार्ग से दो घंटे की दूरी पर स्थित नालंदा और उसका विधानसभा हरनौत- जिसके एक गांव बेलछी में मई 1977 में घटित हुआ था। वहां जातीय संघर्ष में 11 लोगों को जिंदा जला दिया गया था। 14 साल के एक लड़के ने आग से निकलने की कोशिश की तो उसे पकड़कर दुबारा आग में झोंक दिया गया। उसकी चीखें आग की लपटों में राख हो गईं। पूरा देश सन्न रह गया था। मृतकों में पासवान जाति के आठ और सुनार जाति के तीन लोग शामिल थे। वर्ष 1977 में इंदिरा गांधी सत्ता से बेदखल हो गई थीं और केंद्र में जनता पार्टी की सरकार थी। मोरारजी भाई देसाई प्रधानमंत्री थे तथा बिहार में कर्पूरी ठाकुर की सरकार थी। सत्ता में दूर—दूर तक कांग्रेस के वापस लौटने की संभावना नहीं थी। वहीं, सत्ता से बेदखल हो चुकी इंदिरा गांधी ने दूरदर्शिता का परिचय देते हुए बेलछी जाने का कार्यक्रम बनाया। उनकी पारखी नजर ने ताड़ लिया था कि इस घटना का प्रसार और प्रभाव देश ही नहीं, विदेशों में भी होगा। पटना तक हवाई जहाज, फिर मूसलधार बारिश में कार में कुछ ही दूर चली थीं कि कार कीचड़ में फस गई। उसके बाद ट्रैक्टर का सहारा लिया गया। उसके आगे नदी को पार करने के लिए बिना हौदे की हाथी पर सवार होकर उनका काफिला बेलछी गांव पहुंचा। वहां पीड़ित परिवार को लगा, जैसे कोई देवदूत उनके दुख को बांटने आ गया हो। महिलाएं उनके गले लगकर फफक—फफक कर रोईं और कहा कि हमलोगों से बड़ी भूल हो गई कि हमने चुनाव में आपको वोट नहीं दिया। फिर सच में इंदिरा गांधी की यह यात्रा देश के लोगों का दिल जीत लिया और परिणामस्वरूप वर्ष 1980 में कांग्रेस भारी बहुमत से सत्ता में वापस लौटी।

समझ में यह बात नहीं आती कि हमारे राजनीतिज्ञ सत्ता—सुख भोगने के नाम पर इतने निरीह क्यों हो जाते हैं? उसका जीता-जागता उदाहरण पश्चिम बंगाल में देखने को मिला है जहां पिछले महीने बंगाल में तृणमूल कांग्रेस नेता की हत्या के बाद बेलछी कांड की तरह दस लोगों को जिंदा जला दिया गया है। फिर उसी तरह हिंसा में मरने वाले सोना शेख नामक पीड़ित के बारे में कहा जाता है कि उसके घर को जलाने से पहले उसे काटा गया, फिर उस कटे अंग को आग के हवाले कर दिया गया। यदि ऐसा हुआ है तो यह बर्बरता की पराकाष्ठा है। निश्चित तौर पर अब उसकी जांच होगी और अपराधियों को सजा तो मिलेगी ही, लेकिन इस बर्बरता को जिन परिवारों ने झेला है और जिसके असह्य दुख का जीवन में अब कोई अंत नहीं होने वाला है, क्या उससे उनका दर्द दूर हो जाएगा? वैसे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी तीन दिन बाद बीरभूम जिले के बोगटूई गांव में पीड़ित से मिलकर उनके दुख-दर्द को जाना। मृतकों के स्वजन को सात-सात लाख रुपये की आर्थिक मदद देने की घोषणा की। पांच-पांच लाख रुपये के चेक सौंप भी दिए गए हैं। दो-दो लाख रुपये पीड़ित परिवार को घर बनाने के लिए दिए जाएंगे। इसके अतिरिक्त पीड़ित परिवार के एक-एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने का वादा किया गया है। देवदूत बनकर पीड़ितों के पास पहुंचकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पीड़ितों के आर्त मन पर मरहम तो निश्चित रूप से लगाया है, लेकिन इसकी जांच तो होनी ही चाहिए कि यह घटना घटी कैसे और इसका मूल अपराधी जो भी है, उसके मन में यह विचार आया कहां से जिसके चलते इस वीभत्स कांड को उसने अंजाम दिया जिसके कारण पूरा देश सदमे में है और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के प्रशासन पर लोगों को संदेह होने लगा है और बंगाल की आम जनता भयभीत है।

बंगाल की हृदयविदारक घटना के लिए कहा जाता है कि बीरभूम जिले में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के कब्जे वाली बरशल ग्राम पंचायत के उप प्रधान की शाम को हत्या के बाद भड़की हिंसा में दस लोगों की मौत हो गई। गुस्साए लोगों की भीड़ ने देर रात ही सात—आठ घरों में पेट्रोल छिड़ककर आग लगा दी, जिससे लोग जिंदा जल गए। इनमें दो बच्चे भी शामिल थे। राज्य सरकार ने मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय एसआईटी का गठन किया है। एडीजी ज्ञानवंत सिंह की अगुआई में गठित इस टीम में तीन आईपीएस अधिकारी शामिल हैं। एसआईटी के सदस्य संजय सिंह ने घटनास्थल का दौरा भी किया और उन्होंने माना कि घरों में आग लगाई गई थी। इसके साथ ही रामपुर हाट के थानेदार व एसडीपीओ को राज्य सरकार ने लाइन हाजिर करके निलंबित कर दिया है। इधर, राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने ट्वीट कर इस घटना को भयावह करार दिया है। साथ ही उन्होंने इस बात का भी संकेत दिया है राज्य हिंसा एवं अराजकता की संस्कृति की गिरफ्त में है और यह कांड राज्य में बिगड़ती कानून-व्यवस्था का संकेत है। वहीं, राज्यपाल के इस ट्वीट की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आलोचना करते हुए राज्यपाल को दो पन्ने का पत्र लिखा है जिसमें उन्होंने कहा है कि किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले इस तरह के आरोप बेहद पीड़ादायक व दुर्भाग्यपूर्ण हैं।

भारत में जातीय हिंसा का पुराना इतिहास रहा है। विभिन्न रूपों में जातीय हिंसा हुई है और होती रहती हैं। ह्यूमन राइट्स वॉच की एक रिपोर्ट के अनुसार, ‘भेदभावपूर्ण और क्रूर, अमानवीय और भारत में 165 मिलियन से अधिक लोगों के अपमानजनक व्यवहार को जाति के आधार पर उचित ठहराया गया है। जाति प्रकृति पर आधारित है और वंशानुगत है। यह एक विशेषता निर्धारित है। किसी विशेष जाति में जन्म के बावजूद, व्यक्ति द्वारा विश्वास किए जाने के बावजूद। जाति, वंश और व्यवसाय द्वारा परिभाषित रैंक वाले समूहों में कठोर सामाजिक स्तरीकरण की एक पारंपरिक प्रणाली को दर्शाती है। भारत में जाति विभाजन आवास, विवाह, रोजगार और सामान्य सामाजिक क्षेत्रों में हावी है। बातचीत-विभाजन, जो सामाजिक बहिष्कार, आर्थिक बहिष्कार और शारीरिक हिंसा के अभ्यास और खतरे के माध्यम से प्रबलित होते हैं।’

जातीय नरसंहार के मामले में बिहार देश में अव्वल रहा है। उदाहरण के रूप में 18 मार्च, 1999 की रात जहानाबाद जिले के सेनारी गांव में एक खास अगड़ी जाति के 34 लोगों की गला रेतकर हत्या कर दी गई थी। लक्ष्मणपुर बाथे यह बिहार का सबसे बड़ा नरसंहार माना जाता रहा हैं। 30 नवंबर और 1 दिसंबर, 1977 की रात में हुए इस नरसंहार में रणबीर सेना ने 58 लोगों की हत्या की थी। 25 जनवरी, 1999 की रात बिहार के जहानाबाद जिले के शंकर बिगहा में 22 लोगों का नरसंहार कर दिया गया था। साल 1996 में भोजपुर जिले के बथानी टोला गांव में दलित, मुस्लिम और पिछड़ी जाति के 22 लोगों की हत्या कर दी गई थी। औरंगाबाद जिले के मियापुर में 16 जून, 2000 को 35 लोगों की हत्या कर दी गई थी। बेलछी नरसंहार का उल्लेख पहले ही किया जा चुका है। यह तो बिहार में हुए बड़े नरसंहार की बात है, जबकि छोटे— छोटे नरसंहार तो वहां के लिए आम बात हैं।

मानवता का तकाजा तो यही होता है कि किसी अनहोनी पर राजनीतिक रोटी नहीं सेंकनी चाहिए, लेकिन अब राजनीतिज्ञ आपदा में भी लाभ तलाश लेते हैं। चाहे किसी पार्टी की सरकार क्यों न हो, मानवीय चिता पर हाथ सेंकने जरूर आ जाते हैं। बंगाल की घटना का ही उदाहरण लें, विपक्षी सभी दलों ने अपने सारे घोड़े इस बात के लिए खोल दिए हैं कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के प्रभाव को कैसे कम किया जाए। प्रधानमंत्री ने स्वयं पीड़ितों की पीड़ा को समझते हुए कमान संभालते हुए पीड़ितों के प्रति संवेदना जताते हुए कहा है कि रामपुर हाट की घटना बेहद दुखद है। उम्मीद है कि ऐसा जघन्य पाप करने वालों को राज्य सरकार जरूर सजा दिलवाएगी। कलकत्ता हाई कोर्ट ने रामपुरहाट हिंसा मामले की सीबीआइ जांच के आदेश दिए हैं। अदालत ने एसआइटी को मामले के कागजात और गिरफ्तार लोगों को सीबीआइ के सुपुर्द करने को कहा। सीबीआइ को मामले में सात अप्रैल तक रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की आगे की सुनवाई सात अप्रैल को होगी। कोर्ट ने कहा कि न्याय के हित में सीबीआइ जांच के आदेश दिए जा रहे हैं। अदालत ने साथ ही राज्य सरकार को सीबीआइ जांच में पूरा सहयोग देने का भी निर्देश दिया है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीति विश्लेषक हैं)