प्रेमचंद की 142 वीं जयंती पर जानिए क्या थी उनकी लेखनी की खासियत

इस साल 31 जुलाई को मुंशी प्रेमचंद की 142वीं जयंती है। उनका जन्म वाराणसी के लमही में हुआ था। प्रेमचंद का असली नाम धनपत राय श्रीवास्तव था, लेकिन उनका कलम नाम 'प्रेमचंद' समय से आगे निकल गया और उन्हें महिमा मिली।

20वीं सदी के सबसे प्रतिष्ठित भारतीय लेखकों में से एक मुंशी प्रेमचंद ने लेखन के क्षेत्र में बहुत योगदान दिया है। वह अपने आधुनिक हिंदुस्तानी साहित्य के लिए प्रसिद्ध थे और उन्होंने औपनिवेशिक भारत के युग को यथार्थवाद में निहित अपने लेखन के साथ प्रदर्शित किया। उनका नाम आज भी प्रतिष्ठित हिंदी और उर्दू कथा कथा के एक निश्चित के रूप में मनाया जाता है और माना जाता रहेगा।

इस साल 31 जुलाई को मुंशी प्रेमचंद की 142वीं जयंती है। उनका जन्म वाराणसी के लमही में हुआ था। प्रेमचंद का असली नाम धनपत राय श्रीवास्तव था, लेकिन उनका कलम नाम ‘प्रेमचंद’ समय से आगे निकल गया और उन्हें महिमा मिली। उन्होंने शुरुआत में नवाब राय के कलम नाम का इस्तेमाल किया, लेकिन 1909 में उनके लघु कहानी संग्रह सोज़-ए-वतन की “देशद्रोही” सामग्री के लिए ब्रिटिश सरकार द्वारा निंदा किए जाने पर इसे बदल दिया।

एक उपन्यास लेखक, कहानीकार और नाटककार के रूप में उनका एक शानदार सफर था, और उन्हें लेखन समुदाय द्वारा ” उपन्यास सम्राट ” या “उपन्यासकारों के बीच सम्राट” के रूप में जाना जाता है। प्रेमचंद ने एक दर्जन से अधिक उपन्यास, लगभग 300 लघु कथाएँ, कई निबंध, पत्र और हिंदी में अनुवाद लिखे।

आज से लगभग 141 साल पहले प्रेमचंद का जन्म हुआ और उनकी जीवनी ऐसी रही की जबतक ये धरती रहेगी प्रेमचंद जिंदा रहेंगे। प्रेमचंद की रचना दृष्टि विभिन्न साहित्यों में अभिव्यक्त हुई ,उनकी रचनाओं में तत्कालीन इतिहास बोलता है।

प्रेमचंद को जब हम पढ़ते हैं, लिखते हैं या उन पर बात करते हैं तो ये समझना ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है कि हम प्रेमचंद के जीवन से क्या समझते हैं, उनकी लेखनी से क्या समझते हैं। हम जानते हैं कि आज के दौर में झूठ का बोलबाला है और कई लोगों  की कोशिश होती है कि झूठ और दुष्प्रचार के दम पर वे सफलता की सीढ़ियां चढ़ते चले जाएं हालांकि ऐसा होता भी है लेकिन एक बात याद रखनी चाहिए कि ‘सब दिन होत न एक समाना’ जब दौर बदलेगा ,समय बदलेगा तो सबके कच्चे-चिट्ठे खुलतें हैं, आज जो चीजें सामने नहीं आ पा रहीं वो कल आएंगी क्योंकि कहीं न कहीं सब कुछ दर्ज हो रहा है ।

आज के दौर में लोगों को लगता है कि हमनें सच कह दिया तो उन्हें नाराज़गी मोल लेनी पड़ेगी, सच बोलकर वो सफल नहीं हो सकते,और आजकल इस दौर में ये होता भी है लेकिन मुंशी प्रेमचंद ने इन्हीं बातों पर अपनी एक मशहूर कहानी पंच परमेश्वर में लिखा कि “क्या बिगाड़ के डर से,ईमान की बात न कहोगे”।

मुंशी जी को हम जितना पढ़ते हैं जितना जानते हैं उतना ही हम मानवीय संवेदनाओं को छू पाते हैं, समझ पाते हैं, आश्चर्य होता है कि कैसे मुंशी जी ने उस समय में ही ऐसी बात लिख दी जैसे मानों उनके पास कोई दिव्यदृष्टि रही हो,उनकी लिखी हर बात,कथा,कहानी ,साहित्य सब हर दौर के लिए सटीक मिल जाती है। अच्छे मनुष्य के निर्माण के लिए प्रेमचंद को पढ़ना जरूरी है। उन्होंने  अपने जीवन में जितने भी किरदार निभाए चाहें वो अध्यापक रहे हों, पत्रकार रहे हों ,कथाकार रहे हों या साहित्यकार,उन्होंने हर किरदार को एक अलग रूप में परिभाषित किया है। आज जब कोई बहुत ज्यादा तनाव में हो या डिप्रेशन का शिकार हो तो उसको प्रेमचंद के जीवन से रूबरू होना चाहिए ताकि पता लगे कि संघर्ष जीवन होता है। कहा जाता है कि किसी को जानना हो तो उसके नज़दीक जाना चाहिए, तो प्रेमचंद को भी जानने के लिए ,पढ़ने के लिए उनके नजदीक जाना होगा। प्रेमचंद को हिंदी और हिन्दुस्तांन हमेशा याद रखेगा।