Home ओपिनियन संघ के माइक्रो मैनेजमेंट ने लिखी भाजपा की प्रचंड विजय की पटकथा

संघ के माइक्रो मैनेजमेंट ने लिखी भाजपा की प्रचंड विजय की पटकथा

कृष्णमोहन झा

हाल में ही देश के जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव कराए गए उनमें मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भाजपा ने इतने प्रचंड बहुमत के साथ जीत हासिल की कि कांग्रेस के पैरों तले की जमीन ही खिसक गई जबकि इन तीनों राज्यों में कांग्रेस सत्ता में वापसी का सपना संजोए बैठी थी। चुनाव अभियान के दौरान कांग्रेस के चुनावी रणनीतिकारों को इस बात का जरा सा भी एहसास नहीं हो पाया कि‌ जिस संघ की आलोचना करने में वे सारी हदें पार कर जाते हैं उसी संघ के लाखों कार्यकर्ता मैदानी स्तर पर दिन‌ रात पसीना बहाकर कर‌ भाजपा की शानदार जीत सुनिश्चित करने में प्राणपण से जुटे हुए हैं । सबसे बड़ी बात यह है कि चुनाव परिणामों की घोषणा के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भाजपा की प्रचंड विजय में अपने महत्त्वपूर्ण योगदान का ‌श्रेय लेने की कोई महत्वाकांक्षा भी प्रदर्शित नहीं की। अब कांग्रेस को यह चिंता सता रही है कि अगले साल के उत्तरार्द्ध में होने वाले लोकसभा चुनावों में अपनी प्रतिष्ठा कैसे बचाई जाए और संघ अपनी उसे रणनीति को अंतिम रूप देने में जुट गया है जिसके माध्यम से वह आगामी लोकसभा चुनावों में भाजपा की 2019 से भी बडी जीत सुनिश्चित करने में सफल हो सकेगा। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा संकट यह है कि वह तीन राज्यों में अपनी करारी हार से हताश उन पार्टी कार्यकर्ताओं को किस मुंह से लोकसभा चुनाव की तैयारियों में जुटने के तैयार करे‌ जिनके मनोबल को इन चुनाव परिणामों ने न्यूनतम स्तर पर पहुंचा दिया है। कांग्रेस कार्यकर्ताओं के मन में अब यह धारणा बनना स्वाभाविक है कि देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी अब इतनी सक्षम नहीं रह गई है कि अपने कार्यकर्ताओं के सुरक्षित भविष्य की गारंटी दे सके। यह भी अपने आप में एक विडम्बना है कि एक ओर तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की गारंटी पर पूरे देश को भरोसा है और दूसरी ओर कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष राहुल गांधी की गारंटी उनके अपने कार्यकर्ताओं को भी स्वीकार्य नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी की इसी गारंटी को देश में हर परिवार तक पहुंचाने की जिम्मेदारी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने कंधों पर ली है जो विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन है। तीन राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव परिणामों से यह सिद्ध हो गया है कि संघ जो भी जिम्मेदारी अपने कंधों पर लेता है उसे पूरी शिद्दत के साथ निभाता है।
हाल में ही संपन्न विधानसभा चुनावों में मतदाताओं ने जिस तरहअपने लोकतांत्रिक अधिकार के प्रयोग के प्रति उत्साह प्रदर्शित किया उसके लिए उन्हें संघ मोहन भागवत की उस अपील ने प्रेरित किया जो उन्होंने इस वर्ष विजयादशमी के शुभ अवसर पर संघ के नागपुर स्थित मुख्यालय में अपने वार्षिक उद्बोधन में की थी। इसे भी एक सुखद संयोग ही कहा सकता है कि चुनाव आयोग ने पांच राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव हेतु मतदान का जो कार्य क्रम घोषित किया था उसके कुछ ही दिन पूर्व संघ प्रमुख ने अपने उद्बोधन में नागरिकों से यह अपील की थी कि वे मतदान अवश्य करें और अपने अनुभव के आधार पर अच्छी तरह सोच विचार कर सर्वश्रेष्ठ को चुनें । महत्वपूर्ण बात यह है कि संघ प्रमुख ने अपने उद्बोधन में किसी राजनीतिक दल का नाम नहीं लिया। मोहन भागवत ने लोगों से उनकी भावनाएं भड़काकर उनके वोट हासिल करने की कोशिशों के प्रति सचेत करते हुए देश की एकता, अखंडता, पहिचान और विकास को ध्यान में रखकर मतदान करने का आग्रह किया था। उस अपील ने लोगों के मन मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव छोड़ा और परिणाम सामने है। उल्लेखनीय है कि संघ प्रमुख ने मतदान में नोटा बटन के प्रयोग का कभी समर्थन नहीं किया।2019 में संपन्न लोकसभा चुनावों के दौरान भी संघ प्रमुख ने कहा था कि ” चुप रहने से कुछ नहीं होगा, आपको हां या ना कहना ही होगा।” संघ प्रमुख का मंतव्य यही था कि जितने उम्मीदवार सामने हैं उनमें सर्वोत्तम के पक्ष में लोगों को मतदान करना चाहिए। मतदान हर नागरिक पुनीत जिम्मेदारी है। मोहन भागवत की उस अपील का व्यापक असर हाल के विधानसभा चुनावों में भी देखने को मिला । पिछले चुनावों में 1.4प्रतिशत मतदाताओं ने नोटा का उपयोग किया था जबकि इन चुनावों में यह प्रतिशत घटकर 1 से भी कम रह गया। संघ को विश्वास है कि आगामी लोकसभा चुनावों में नोटा का उपयोग करने वाले मतदाताओं की संख्या में और भी कमी दिखाई देगी। संघ का मानना है कि चुनाव प्रणाली में सुधार मतदाताओं की राय को अहमियत दी जानी चाहिए।
संघ ने अपने लाखों कार्यकर्ताओं के माध्यम से इन विधानसभा चुनावों के माइक्रो मैनेजमेंट का जो अभिनव प्रयोग किया उसने भाजपा की प्रचंड विजय सुनिश्चित करने में कहीं कोई संदेह की गुंजाइश ही नहीं छोड़ी। संघ के कार्यकर्ताओं ने हर विधानसभा क्षेत्र में घर घर जाकर लोगों को मताधिकार के महत्व की अनुभूति कराते हुए उन्हें हर हाल में इस अधिकार के प्रयोग के प्रेरित किया। मतदान के दिन संघ के कार्यकर्ता घर घर जाकर लोगों से मतदान करने का अनुरोध कर रहे थे। जिन क्षेत्रों में मतदान की गति शुरू में धीमी दिखाई दे रही थी वहां संघ के कार्यकर्ताओं ने अनुरोध के बाद मतदान की गति तेज होती चली गई और मतदान का समय समाप्त होने तक सभी स्थानों पर रिकार्ड मतदान दर्ज किया गया। यहां यह भी विशेष उल्लेखनीय है कि मतदान की तारीख को अपने शहर या गांव से बाहर होने के कारण जिस क्षेत्र के मतदाताओं का मतदान में भाग लेना मुश्किल प्रतीत हो रहा था उन्हें भी संघ के कार्यकर्ताओं ने मतदान की तारीख को अपने शहर या गांव में लौट कर मतदान करने के लिए लिए प्रेरित किया। रिकार्ड मतदान सुनिश्चित करने में संघ की यह भूमिका निश्चित रूप से सराहनीय है। आर एस एस के कार्यकर्ताओं ने मतदाताओं से यह अनुरोध किया कि वे मतदान करते समय स्थानीय और क्षेत्रीय मुद्दों के ऊपर राष्ट्रहित को तरजीह दें । संघ के लाखों कार्यकर्ता तीनों राज्यों के करोड़ों मतदाताओं को यह समझाने में सफल रहे कि जनसंख्या नियंत्रण कानून, समान नागरिक संहिता और सीएए से जुड़े कानून बनाने के लिए राज्य सभा में सत्ताधारी पार्टी का बहुमत होना जरूरी है इसलिए उन्हें मतदान करते समय यह बात अपने जेहन में अवश्य रखना चाहिए।
संघ ने जहां एक ओर हर मतदान केंद्र पर अधिकाधिक मतदान सुनिश्चित करने के लिए मतदाताओं को जागरूक करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया वहीं दूसरी ओर पार्टी के अंदर भी क्षेत्रीय क्षत्रपों के बीच सामंजस्य स्थापित करने के लिए संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी निरंतर संबंधित राज्यों के प्रवास पर पहुंच कर सभी क्षत्रपों और गुटीय नेताओं को एक साथ बिठाकर उनमें‌ एकजुटता कायम करने के अभियान में जुटे रहे। इसका परिणाम यह हुआ कि चुनाव प्रचार के दौरान पार्टी में किसी भी स्तर पर पर कोई मतभेद दिखाई नहीं दिया। पार्टी ने हर राज्य में एकजुट होकर चुनाव लड़ा और प्रचंड बहुमत हासिल कर इतिहास रच दिया। इसके साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि संघ की सलाह से ही भाजपा ने केंद्रीय मंत्रियों और सांसदों को विधानसभा चुनावों में उम्मीदवार बनाने की रणनीति पर अमल किया और वह रणनीति बेहद सफल रही। भाजपा ने केंद्रीय मंत्रियों और सांसदों को विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार बनाने की जो रणनीति अपनाई उसका यह फायदा हुआ कि केवल एक विधानसभा क्षेत्र ही नहीं बल्कि आसपास के कई विधानसभा क्षेत्रों में भी पार्टी उम्मीदवारों की जीत की संभावनाएं बेहतर हो गईं। संघ ने पहली बार विधानसभा चुनावों के माइक्रो मैनेजमेंट का जो प्रयोग किया उसकी कामयाबी ने भाजपा विरोधी राजनीतिक दलों को हक्का बक्का कर दिया है । संघ कोई हल्ला गुल्ला किए बिना अपने काम में लगा रहा और भाजपा विरोधी राजनीतिक दलों को इसकी कानों कान खबर ही नहीं हुई। इसका अहसास तो उन्हें तब हुआ जब चुनाव परिणामों की घोषणा ने उनके पैरों तले की जमीन ही खिसका दी।अब इन दलों को यह चिंता सता रही है कि संघ का यह माइक्रो मैनेजमेंट कहीं आगामी लोकसभा चुनावों में भी उन्हें फिर से शोचनीय हार का सामना करने के लिए विवश कर सकता है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

Exit mobile version