ये है चर्चा में आए प्रोफेसर लल्लन की असली कहानी

बिहार के उच्च शिक्षण संस्थानों को देखें तो कमोबेश यही हाल हर जगह है। सैलरी लौटाने वाले प्रोफेसर के खाते में थे 970 रुपए, चेक भेज दिया 24 लाख का, अब बताया क्यों की ये गलती?सैलरी लौटाने वाले प्रोफेसर के खाते में थे 970 रुपए, चेक भेज दिया 24 लाख का, अब बताया क्यों की ये गलती?

पटना। बिना पढाए वेतन लेने की ‘अनैतिकता’ की दुहाई देते हुए मुजफ्फरपुर के एक प्रोफेसर लल्लन कुमार ने 33 महीने के वेतन का 23 लाख 82 हजार रुपए विश्वविद्यालय को लौटा देने की पेशकश की। खबर फैलते ही लल्लन सोशल मीडिया का हीरो बन गया। बात बढी तो बवाल भी बढा। विश्वविद्यालय प्रशासन और शिक्षक संघ को पता चला कि वेतन लौटाकर अपनी महानता का ऐलान करने वाले लल्लन की कहानी तो वैसी नहीं है जैसी वह मीडिया को बता रहा है। दो दिन के भीतर ही सच्चाई सामने आ गयी कि लल्लन ने यह सारा प्रपंच अपने तबादले के लिए किया था।
प्रो. लल्लन कुमार मुजफ्फरपुर के नितीश्वर कॉलेज में हिन्दी विभाग के सहायक प्रध्यापक है। मुजफ्फरपुर का यह कॉलेज भागलपुर के डॉ बीआर अंबेडकर विश्वविद्यालय से जुड़ा हुआ है। उसकी नियुक्ति सितंबर 2019 में हुई थी। अचानक करीब तीन साल बाद उसने जब चेक सहित अपने तबादले का आवेदन विश्वविद्यालय प्रशासन को यह कहते हुए दिया कि पढाने के लिए छात्र ही नहीं हैं तो वेतन वापस कर रहा हूं तो विश्वविद्यालय प्रशासन ने उसका चेक यह कहते हुए लेने से इंकार कर दिया कि यहां गुम हो जाएगा। हालांकि कुलपति को संबोधित उसका तबादले वाला आवेदन जरूर ले लिया।
प्रशासन के सामने एक संकट यह भी था कि वेतन भुगतान में दिये गये पैसे का चेक वापस भी ले लेते तो इसे किस मद में जमा करते? लेकिन जब लल्लन कुमार ने अपना आवेदन सार्वजनिक कर दिया तब अचानक एक और जानकारी सामने आयी कि उसने 23 लाख का चेक कैसे काट दिया जबकि उसके खाते में 910 रूपये ही हैं।
सवाल ये है कि बिहार में क्या यह पहला मामला है जहां प्राध्यापक और विश्वविद्यालय आपस में ही टकरा रहे हैं? बिहार में इस समय 7 राज्य विश्वविद्यालय और 4 केन्द्रीय विश्वविद्यालय हैं। इनसे संबद्ध दर्जनों कालेज हैं। इसके अलावा एक आईआईटी और एक एम्स भी संचालित हो रहा है।
बिहार के कई कालेजों में प्राध्यापकों के पद बड़े पैमाने पर खाली है। कई विषयों में एक भी प्राध्यापक नहीं हैं, विभाग बंद होने की स्थिति में हैं तो वहीं किसी किसी विषय में अनेक प्राध्यापक तैनात हैं। उनकी तैनाती में कालेज की जरूरत और प्राध्यापकों की मेधा व वरीयता को नहीं देखा जाता, बल्कि पैरवी और दूसरे कारणों से नियुक्ति और तबादले होते हैं। प्रमुख कालेजों में प्रोफेसरों की जगह खाली रहने पर मेहमान प्राध्यापक से काम चलाया जाता है। इन मेहमान प्राध्यापकों की नियुक्ति व भुगतान में धांधली होती है। एक उदाहरण मुजफ्फरपुर के ही आरडीएस कालेज का सामने आया है जहां पंचायत चुनावों के दौरान दो महीने कालेज बंद रहने के बावजूद मेहमान शिक्षकों को 50 हजार मासिक मानदेय का भुगतान हुआ।
प्राध्यापक डॉ लल्लन कुमार का ही मामला लें तो उसे ऐसे डिग्री कालेज में रखा गया जिसमें या तो कक्षाएं लगती नहीं, लगती हैं तो छात्र नहीं आते। डॉ लल्लन की कुंठा की शुरुआत नियुक्ति के साथ ही शुरू हो गई जब उसे मुजफ्फरपुर के एक नामालुम से कालेज में पदस्थापित कर दिया गया। दिल्ली विश्वविद्यालय और जेएनयू से पढ़े लल्लन ने तबादले के लिए छह बार विश्वविद्यालय प्रशासन को ज्ञापन दिया। हाल में भी कुछ तबादले हुए हैं, उनमें अपना नाम नहीं देखकर क्षुब्ध लल्लन ने पब्लिसिटी स्टंट कर दिया।
हालांकि खबर आने के बाद उसके दावे की पोल खुल गयी और लल्लन ने प्राचार्य मनोज कुमार के माध्यम से कुल सचिव रामकृष्ण ठाकुर को पत्र लिखकर गलती मान ली। नीतीश्वर कालेज शिक्षक संघ ने भी डॉ लल्लन की शून्य विद्यार्थी वाली बात को गलत बताया। विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार ठाकुर बताते हैं कि प्राचार्य से रिपोर्ट मांगी गई है और रिपोर्ट मिलने पर कार्रवाई की जाएगी। डॉ लल्लन ने विश्वविद्यालय को ज्ञापन उचित माध्यम से नहीं दिया था। इसके लिए उन पर अब अनुशासनात्मक कार्रवाई भी की जा सकती है।
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लेकिन इस पूरे मामले में दोषी अकेले लल्लन कुमार हैं ऐसा नहीं है। डॉ बीआर अंबेडकर विश्वविद्यालय के कुलपति हनुमान प्रसाद पांडेय पर आरोप है कि वो विश्वविद्यालय के काम काज पर ध्यान नहीं दे पाते हैं। उनके पास विश्वविद्यालय का अतिरिक्त प्रभार है इसलिए अक्सर वो कार्यालय नहीं आ पाते हैं। उत्तर प्रदेश के निवासी श्री पांडे की अनुपस्थिति के कारण भी कई समस्याएं उत्पन्न होती हैं। छात्रों को प्रमाणपत्र नहीं मिलते क्योंकि कुलपति का दस्तखत नहीं हुआ।
सेवानिवृत होने वाले शिक्षकों, कर्मचारियों के पेंशन व अन्य सुविधाओं का लाभ नहीं मिलता क्योंकि कुलपति का हस्ताक्षर नहीं है। इन समस्याओं को लेकर इसी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर योगेन्द्र धरना पर भी बैठ चुके हैं, पर कोई नतीजा नहीं निकला। विश्वविद्यालय में भ्रष्टाचार व अराजकता का आलम यह है कि कोई भी काम सामान्य गति से नहीं हो पाता। डॉ योगेन्द्र बताते हैं कि सारी बातें शिक्षामंत्री को बताई गई, पर कुछ नहीं हुआ। स्थाई कुलपति की नियुक्ति के लिए मई में इंटरव्यू हुआ पर नियुक्ति अभी तक नहीं हुई।
पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के हेमंत कुमार झा इस मामले को एकदम अलग ढंग से प्रस्तुत करते हैं। उन्हीं के शब्दों में- “भले लल्लन कुमार महज दो दिनों में हीरो से जीरो बने दिखते हों पर बिहार के उन हजारों प्रोफेसरों से अधिक जीवंत साबित हुए हैं जो अपने हक, सम्मान और अपने संस्थानों की गरिमा पर निरंतर हो रही चोटों को चुपचाप सहने और अपने तक सिमटे रहने के अभ्यस्त हो गए हैं।”
हेमंत झा कहते हैं “इस समय बिहार के अधिकतर विश्वविद्यालयों में प्रशासनिक अराजकता, वित्तीय अनियमितता और नीतिगत अपंगता के सतत आरोप अतीत के सारे रिकार्ड तोड़ चुके हैं। इसका सबसे निरीह शिकार वह शिक्षक ही बन रहा है जो पढाने के अलावा इधर उधर की बातों में शामिल नहीं रहता।” स्वयं श्री झा का मामला भी अलग नहीं है। विश्वविद्यालय चयन आयोग की वरीयता सूची में अव्वल होने के बावजूद उन्हें एक ग्रामीण कालेज में भेज दिया गया। तबादले की मांग लेकर विश्वविद्यालय प्रशासन के पास गुहार लगाने के बजाए उन्होंने लेखन का रास्ता चुना और विभिन्न विषयों पर धारदार टिप्पणी की वजह से सोशल मीडिया में काफी चर्चित हैं। लेकिन विश्वविद्यालयों के अन्यायपूर्ण नियुक्ति और तबादला नीति के प्रति कम क्षुब्ध नहीं हैं। वो बताते हैं “बिहार के विश्वविद्यालयों में नियुक्ति और तबादला या तो पैरवी से होती है या कुछ ले देकर।”
विश्वविद्यालयों की इस राजनीति का शिकार शिक्षक ही नहीं छात्र भी हो रहे हैं। बिहार में तकरीबन सभी विश्वविद्यालयों के सत्र विलंब से चल रहे हैं। पढ़ाई के लिए छात्रों को बाहर के विश्वविद्यालयों में जाना या कोचिंग संस्थानों की शरण लेना मजबूरी हो गया है। बिहार की शिक्षा व्यवस्था के लिए इस समय यही कहा जा सकता है कि बिहार का लल्लन बिहार से बाहर जाकर भले टॉप करता हो लेकिन बिहार में रहकर वह फ्लॉप ही साबित होता है। लल्लन कुमार प्रकरण से बिहार के विश्वविद्यालयों और समूची शिक्षा व्यवस्था की अराजकता, भ्रष्टाचार और माफियागिरी का पर्दाफाश हुआ है, उस पर विश्वविद्यालयों और राज्य प्रशासन को गंभीरता से काम करने की जरूरत है।

(वरिष्ठ पत्रकार अमरनाथ झा से साभार)