इंडिया गठबंधन के पहली गांठ का जिम्मेदार कौन ?

जब भारतीय राजनीति जाति की चाक पर चल रही हो, तो ऐसे में दलित समुदाय से आने वाले देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल कांग्रेस के मुखिया 80 वर्षीय मल्लिकार्जुन खरगे के साथ ही खेला हो गया। कुछ महीने पहले इंडिया गठबंधन में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री व तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी ने गठबंधन का नेता बनाने की बात कही थी। उसमें सहमति दिल्ली के मुख्यमंत्री व आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने भरी थी। इन दोनों ने मिलकर इंडिया गठबंधन बनाने की शुरुआत करने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राजनीतिक महत्वाकांक्षा के गला घोंटने का भरसक प्रयास किया था।

लेकिन, राजनीति के खेल में अब तो खेला मल्लिकार्जुन खरगे के साथ ही हो गया। पहले तृणमूल कांग्रेस की मुखिया ममता बनर्जी ने अपने राज्य पश्चिम बंगाल में सभी लोकसभा सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी। उसके बाद आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल के इशारे पर उनकी ही पार्टी के पंजाब में मुख्यमंत्री भगवंत मान ने पंजाब में एकला चलो का राग अलाप दिया। और तो और, रही सही कसर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कर दी। बिहार की राजनीति में बड़ा उलटफेर हुआ और नीतीश कुमार ने राजद, कांग्रेस को धकियाते हुए एक बार फिर भाजपा के साथ अगल-बगल की कुर्सी को साझा कर लिया।

ऐसे में खेला सबसे बड़ा खरगे के साथ ही हुआ। जब ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल ने खरगे के नाम की बात उठाई, तो नीतीश कुमार के साथ ही राजद सुप्रीमो लालू यादव चौंके थे। कारण, दोनों की महत्वाकांक्षाओं पर तुषारापात हुआ था। कांग्रेस नेताओं की स्थिति ऐसी है कि वो गांधी परिवार के बाहर सत्ता का चेहरा बनाने की सोचे तो मानो एक तरह से उनको पाप लगता है। इसी परिपाटी का पालन करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने भी अपना नेता सांसद राहुल गांधी व पार्टी के पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी को ही बताया था।

हालांकि, राजनीतिक गलियारों में खरगे की जातिगत राजनीति और उससे होने वाले हानि लाभ का गुना-भाग किया जाने लगा। कहा यह भी जा रहा था कि चूंकि खरगे दक्षिण से आते हैं और दक्षिण में अभी भाजपा कमजोर है। ऐसे में खरगे को आगे करने से कांग्रेस सहित इंडिया गठबंधन को भाजपा के मुकाबले लीड मिल सकती है।

विपक्षी नेताओं की आखिरी बैठक 19 दिसंबर को हुई थी। उसके बाद साइडलाइंस का कुछ बैठकें हुई हैं। ‘इंडिया’ की आखिरी बैठक में तय किया गया था कि तीन हफ्ते में सीट बंटवारा फाइनल कर लिया जाएगा। ध्यान रहे तीन हफ्ते की यह डेडलाइन भी कई बार की विफलता के बाद तय हुई थी। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी बेंगलुरू में हुई दूसरी बैठक के समय यानी जुलाई से ही दबाव डाल रहे थे कि जल्दी सीट बंटवारा किया जाए। ममता ने तो 31 अक्टूबर की डेडलाइन दी थी। लेकिन तीन राज्यों के चुनाव की वजह से तीन महीने से ज्यादा समय तक ‘इंडिया’ को कोई बैठक ही नहीं हुई।

जब कांग्रेस हिंदी पट्टी के तीनों राज्यों में हारी तो आनन-फानन में मीटिंग की एक तारीख तय की, जिसे विपक्षी नेताओं ने खारिज कर दिया। उसके बाद 19 दिसंबर को बैठक हुई, जिसमें तीन हफ्ते की समय सीमा तय की गई। अब उस बैठक के तीन क्या पांच हफ्ते बीत चुके हैं और कहीं भी सीट बंटवारे की बात तय नहीं हुई है। कुछ राज्यों को लेकर शुरुआती बातचीत जरूर हुई है लेकिन फैसला कहीं हो पाया है। उलटे कई राज्यों में बातचीत में बाधा आ गई है, जिसके बाद वार्ता बंद हो गई है। आम आदमी पार्टी के साथ कई दौर की बातचीत हुई लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि पंजाब को लेकर कोई तालमेल नहीं होगा इसी तरह ममता बनर्जी ने कहा है कि पश्चिम बंगाल छोड़ कर वे बाकी जगह तालमेल के लिए तैयार हैं तो सीपीएम ने कहा है कि केरल छोड़ कर बाकी जगह उसे तालमेल करना है। हालांकि इनमें से किसी के साथ अंतिम समझौता नहीं हुआ है।

इसी तरह 19 दिसंबर के बाद हुई एक वर्चुअल बैठक में एक और बहुत अहम फैसला हुआ था। सूत्रों के हवाले से ही खबर आई थी लेकिन खबर पक्की थी कि सभी नेताओं ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को ‘इंडिया’ का अध्यक्ष बनाने की सहमति दे दी है। उस दिन नीतीश कुमार को लेकर कुछ विवाद भी हुआ और बाद में खुद नीतीश ने संयोजक बनने से मना कर दिया। लेकिन अध्यक्ष का नाम तय कर दिया था। फिर दो हफ्ता बीत जाने के बाद भी अभी तक आधिकारिक रूप से गठबंधन के अध्यक्ष के तौर पर खड़गे के नाम की घोषणा नहीं हुई है। सोचें, जब विपक्षी पार्टियों के नेता अपने गठबंधन का अध्यक्ष नहीं तय कर पा रहे हैं तो उससे नेतृत्व को लेकर आम लोगों में क्या मैसेज जा रहा होगा!

ऐसे ही विपक्षी गठबंधन के नेताओं ने हर महीने एक बैठक करने का फैसला किया था। लेकिन साढ़े तीन महीने बाद हुई 19 दिसंबर की बैठक के बाद फिर एक महीने से ज्यादा हो गए लेकिन बैठक नहीं हुई है। मुंबई की बैठक में एक सितंबर को तय हुआ था कि विपक्ष की साझा रैली होगी। पिछले दिनों की बैठक के बाद मल्लिकार्जुन खड़गे के हवाले खबर आई थी कि आठ साझा रैलियां होंगी। लेकिन अभी तक एक भी रैली की घोषणा नहीं हुई है। मुंबई की बैठक के बाद भोपाल में साझा रैली प्रस्तावित थी, जिसे चुनाव की वजह से कमलनाथ ने रद्द कर दिया था। उसके बाद से विपक्ष के सभी नेताओं के एक मंच पर आने का इंतजार हो रहा है।

आंकड़ों की जुबानी बात करें, तो इंडिया-समूह के 28 राजनीतिक दलों में से 12 का लोकसभा में एक भी सदस्य नहीं है, मगर फिर भी निचले सदन में उसके पास 142 सांसद हैं। 98 सदस्य राज्यसभा में अलग हैं। देश भर में 1637 विधायक उस के पास हैं और विधान परिषदों में 120 सदस्य हैं। 10 प्रदेशों में इंडिया-समूह की सरकारें हैं। इसलिए अगर इंडिया-समूह पूरे ईमानदार तालमेल और आपसी भलमनसाहत के साथ अपनी बिसात बिछाए तो क्या आप को नहीं लगता कि वह केंद्र में सरकार बनाने के लिए ज़रूरी 130 अतिरिक्त सीटें जीत सकता है? लालू प्रसाद-तेजस्वी यादव के राष्ट्रीय जनता दल का लोकसभा में अभी एक भी सदस्य नहीं है।अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी के अभी सिर्फ़ 3 लोकसभा सदस्य हैं।

अब वर्तमान का सच यही है कि खरगे के नाम को जिन लोगों ने आगे किया, वही उनकी लुटिया डुबो दिया। जब इंडिया गठबंधन के तीन प्रमुख नेता और लोकसभा चुनाव के हिसाब से तीन बड़े राज्य से ही ऐसा संदेश हो, तो दिल्ली के सात लोकसभा सीटों को भी इसमें ही शामिल किया जाना चाहिए। जब पंजाब में आम आदमी पार्टी ने आंख दिखाया है, तो दिल्ली में तो आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल कांग्रेस से भला क्यों गलबंहियां करेंगे।