गांधी सेतु का उद्घाटन.. उत्तर बिहार के विकास का वरदान…

पटना। हमने प्लस टू कर लिया था आगे की पढ़ाई के लिए पापा हमे पटना शिफ्ट करने चाहते थे उसी दौरान साल 2001 में हम पहली बार अकेले पटना आए तब भीषण जाम से हमारी पहली मुलाकात गाँधी सेतु के हाजीपुर छोड़ स्थित टॉल प्लाजा पर से हुई थी, बाल मन विचलित हो रहा था, कैसा शहर है, कैसे लोग है कैसी व्यवस्था है…कैसे और किस हालत में गंतव्य तक पहुँचेगे…कुछ घण्टो फंसे रहने के बाद हमने भी फैसला किया की पैदल ही चलते है ज्यादा नही 5-6 किलोमीटर की ब्रिज है यू ही पर कर लेंगे, लाइफ में पहली संघर्ष करने के वास्ते जून की दोपहरी में पीठ पर बैग लिए तपती सड़को पर भूखे-प्यासे चल दिए, खैर ये समस्या हमारी अकेले की नही थी, अगर यू कहे तो उत्तर बिहार के लोगो के लिए पटना आने का सबसे बड़ा संघर्ष तो गांधी सेतु से सकुशल पार करना ही था, वो दिन था और आज का दिन है पुल पर तभी काम चल रहा था और आज भी काम चल रहा है।

फर्क सिर्फ इतना था कि तब काम दिशाहीन हो रहे थे और आज अंतिम दिशा में…23 वर्षो से हमने ऐसा कोई वक्त नही देखा जब ब्रिज पर काम नही चल रहे हो..हम अगर कहे कि विभाग और ठेकेदारों के लिए गांधी सेतु किसी कामधेनु गाय से कम नही तो कोई बड़ी बड़ी बात नही होगी, त्योहारों और लगन के सीजन में 10-10 घँटे के जाम ने कितनो के जीवन-मरण का गवाह बना ये पुल, आज के दिन उत्तर बिहार के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों से इतिहास लिखने जा रहा है, खुशी इतनी है कि शब्द कम पर रहे है, मोदी कैबिनेट के एक मात्र जिम्मेदार और कामकाजी मंत्री श्री नितिन गडकरी जी की जितनी प्रशंसा की जाए वो कम हैं, उनकी दूरदर्शिता और प्रतिबद्धता ने आज उत्तर बिहार को गांधी सेतु के नए रूप को समर्पित किया है, जहाँ पैदल और बाइक वालो के लिए सेपरेट लैन के साथ फॉर लैन ब्रिज होंगे, सुलभ यात्रा के साथ, जाम की असुविधा दूर-दूर तक नही होंगे, निश्चित रूप से उत्तर बिहार के लिए कई दशक बाद गांधी सेतु का इनॉगरेशन सुखद यात्रा का अगुआ बनेगा।