शिवाजी कॉलेज में राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ की 150वीं वर्षगांठ का भव्य आयोजन

 

शिवाजी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ के अवसर पर एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम कॉलेज की सांस्कृतिक समिति, एनसीसी एवं एनएसएस के संयुक्त तत्वावधान में देशभक्ति, राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक चेतना को समर्पित रहा। आयोजन का उद्देश्य भारतीय राष्ट्रवाद की भावना को सुदृढ़ करना तथा वंदे मातरम् की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक विरासत पर सामूहिक चिंतन करना था।
इस अवसर पर दिल्ली विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति प्रो. योगेश सिंह मुख्य अतिथि के रूप में एवं शिवाजी कॉलेज शासी निकाय के अध्यक्ष प्रोफेसर विंध्य वासिनी पांडेय विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। कार्यक्रम की शुरुआत शिवाजी प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित करने के साथ हुई, जिसके पश्चात गार्ड ऑफ ऑनर प्रस्तुत किया गया। कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण ‘वंदे मातरम्’ शिलापट्ट का अनावरण रहा। यह शिलापट्ट स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्र के लिए किए गए असंख्य बलिदानों की स्मृति को स्थायी रूप से अंकित करता है । इसके बाद मुख्य अतिथि
माननीय कुलपति प्रो. योगेश सिंह द्वारा दीप प्रज्वलन एवं सरस्वती वंदना के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ एवं वंदे मातरम् के रचयिता, महान साहित्यकार श्री बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय को पुष्पांजलि अर्पित की गई।
अपने मुख्य संबोधन में माननीय कुलपति प्रो. योगेश सिंह ने राष्ट्रीय गीत के महत्व पर सारगर्भित विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि जहाँ राष्ट्रगान संवैधानिक और राजनीतिक एकता का प्रतीक है, वहीं राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ भारत की सांस्कृतिक और सभ्यतागत पहचान को अभिव्यक्त करता है। यह गीत विविध भाषाओं, संस्कृतियों और समुदायों को साझा भावनाओं, प्रतीकों और मूल्यों के माध्यम से एक सूत्र में बाँधता है। उन्होंने विद्यार्थियों से “भावना के रूप में राष्ट्रवाद” और “जीवन के व्यवहार में राष्ट्रवाद” के बीच की दूरी को समाप्त करने का आह्वान किया तथा कहा कि राष्ट्र के प्रति सम्मान न्याय, समानता, कर्तव्यबोध और जिम्मेदार नागरिकता में परिलक्षित होना चाहिए। कुलपति प्रोफेसर योगेश सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, विश्वनाथ मुखर्जी और श्यामजी कृष्ण वर्मा का उल्लेख करते हुए वंदे मातरम गीत के 150 वर्षों के इतिहास को संक्षेप में बताया। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम मातृभूमि के प्रति भारतीयों के कर्तव्य की पुनरावृत्ति है। उन्होंने छात्रों में देशभक्ति और राष्ट्रवाद की भावना को बढ़ावा देने के लिए जागृति और आनंदमठ जैसी फिल्मों का भी जिक्र किया।

शिवाजी कॉलेज के युवा एवं ऊर्जावान प्राचार्य प्रो. वीरेंद्र भारद्वाज ने स्वागत भाषण में कॉलेज की उस प्रतिबद्धता को रेखांकित किया, जिसके माध्यम से वह विद्यार्थियों और समाज में राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक मूल्यों और सामाजिक उत्तरदायित्व को निरंतर सुदृढ़ करता आ रहा है। इस अवसर पर परंपरा और सामाजिक संवेदना के सुंदर समन्वय के रूप में माननीय कुलपति को अंगवस्त्रम एवं फल-टोकरी भेंट की गई। अनाथालयों तथा में वितर संदेश दिय
कार्यक्रम का सबसे भावनात्मक क्षण ‘वंदे मातरम्’ का सामूहिक गायन रहा। इस सामूहिक प्रस्तुति ने सभागार को देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत कर दिया। यह गायन एक ऐसी भावनात्मक-सांस्कृतिक अनुभूति बन गया, जिसमें मातृभूमि को केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि एक पवित्र और आध्यात्मिक सत्ता के रूप में अनुभव किया गया।
कार्यक्रम के अंत में माननीय कुलपति द्वारा स्वदेशी संकल्प शपथ दिलाई गई, जिसने स्वदेशी आंदोलन के दौरान वंदे मातरम् की ऐतिहासिक भूमिका को एक बार फिर स्मरण कराया—एक ऐसे प्रेरक नारे के रूप में जिसने देशवासियों को स्वतंत्रता संग्राम में एकजुट किया।
समारोह का समापन प्रो. दीपिका यादव द्वारा प्रस्तुत औपचारिक धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। उन्होंने माननीय अतिथियों, आयोजकों, शिक्षकों, कर्मचारियों और विद्यार्थियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इस प्रकार के आयोजन न केवल अतीत की विरासत से जोड़ते हैं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए राष्ट्रभक्ति के मूल्यों को भी सुदृढ़ करते हैं।
यह कार्यक्रम शिवाजी कॉलेज के लिए एक गौरवपूर्ण अवसर सिद्ध हुआ, जिसने वंदे मातरम् के 150 गौरवशाली वर्षों को स्मरण करते हुए राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक आत्मबोध और सामाजिक उत्तरदायित्व का सशक्त संदेश दिया।