ये है रेवती की कहानी : कभी खाने की थी दिक्कत, अब टोक्यो ओलंपिक में होगी भारत की उम्मीद

400 मीटर की दौड़ महज 54 सेंकेड से कम समय में पूरा किया। नतीजा, टोक्यो ओलपिंक का टिकट। जीवन के कई संकटों का सामना करते हुए रेवती अपने बूते किस्मत लिख रही है।

नई दिल्ली। समय कैसा प्रतिकूल हो, यदि आपके जज्बा और जुनून हो, तो मंजिल हासिल कर सकते हैं। जिसके पास खाने की दिक्कत थी। समाज से अपेक्षित सहयोग नहीं मिला। जिसे प्रशिक्षण की सुविधा मयस्सर नहीं थी। आज की तारीख में वह देश का प्रतिनिधित्व करने वाली है । टोक्यो ओलंपिक (Tokyo Olympic) में वह भारत की बेटी देश के करोड़ों लोगों की उम्मीद बन चुकी है। 400 मीटर दौड़ में वह हिस्सा ले रही है।

असल में हम बात कर रहे हैं रेवती की। रेवती वीरामनी (Rewati Veermani) । तमिलनाडु की रहने वाली है। जब वह केवल सात साल की थी, तो पिता इस दुनिया से चल बसे। 8 साल ही कुई तो मां का साया सिर से उठ गए। बिन मां-बाप की बेटी के पास जूते तक नहीं थे। था तो केवल जज्बा और जुनून। नंगे पांव ही दौड़ना शुरू किया। उसके कभी हार नहीं मानी। उसी का नतीजा है कि अब वह भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए टोक्यो ओलंपिक में देश का नाम रौशन करेगी।

आज यदि सबसे अधिक खुशी किसी को मिल रही है, तो वह है रेवती का ननिहाल। मां-बात की मौत के बाद रेवती को उसके नाना और नानी ने ही लालन-पालन किया है। उसके बाद उसके कोच कानन। जब पहली बार उन्होंने रेवती (Rewati Veermani) को नंगे पैर दौड़ते देखा तो हतप्रभ रह गए थे। उसके बाद उसे जूता दिलवाया और कॉलेज की फीस भी।
जीवन के संघर्ष पथ पर आगे बढ़ते हुए उसे कुछ समय पहले दक्षिण रेलवे में नौकरी मिल गई। अब जीवन पहले से आसान हुई है।