याद आया द्वापर युग, परिवार में सत्ता के लिये फिर से शुरु हुई महाभारत

महत्वहीन है ऐसे में जिन 4 सांसदों के सहारे हम 5 हुए है पशुपति पारस क्षणिक आनन्द सुख भोग सकते है

चिराग जिसे अपनों ने लूटा गैरों में कहाँ दम था,चिराग की लॉ मद्धिम जरूर हुई पर बुझ गई यह कहना जल्दवाजी होगी सत्तालोलुपता के आगे चाचा पारस ने रिश्ते के मायने ही बदल कर रख दिया चिराग के बाप रामविलास पासवान ने जिस पारस रामचन्द्र जैसे भाई और

प्रिंस राज भतीजे के कारण सबदिन वांशवाद का आरोप झेला भाई भतीजो पर सब कुछ न्योछावर किया उनकी मृत्यु के छह माह बाद ही उनकी पत्नी और पुत्र के पीठ में खंजर भोंक दिया इसका तात्कालीक लाभ भले ही उन्हें केन्द्र में मंत्री बनने का मौका मिल जाय वो संसदीय दल का नेता राष्ट्रीय अध्यक्ष या अन्य जो भी पद पर काबिज हो जाएं पूरी लोजपा पार्टी को जेब मे कर लें किसी के इशारे पर किसी के गोद मे बैठ जाएं यह तात्कालिक होगा जहां तक रामविलास पासवान की विरासत मतलब पासवान समाज का लोग चिराग को ही नेता मानेंगे चुनाव में वोट के आगे नेता बिल्कुल महत्वहीन है ऐसे में जिन 4 सांसदों के सहारे हम 5 हुए है पशुपति पारस क्षणिक आनन्द सुख भोग सकते है पर जब असली परीक्षा यानी चुनाव आएगा तो यह बिल्कुल साफ है ,

उनका समाज उनकी रत्तीभर नही सुनेगा बल्कि चिराग जो जैसा कहेंगे चाहेगे वैसा ही होगा यानी रामविलास पासवान की पार्टी पर भले ही पारस कब्जा कर लें पर वोटबैंक जैसा महत्वपूर्ण पूंजी चिराग के पास ही रहेगा चिराग समाज के नेता है और रहेंगे यह पूंजी उनसे कोई नही छीन सकता वो जुआ जरूर हारे हों पर महाभारत बिल्कुल नही।